रंगों की प्रकाशमय बाजीगरी


शब्दों की जादूगरी हो या लाल, हरे, नीले, पीले... रंगों के संतुलित समायोजन से आसपास की भागती जिंदगी, प्रकृति ही नहीं, बल्कि सपनों से लेकर कल्पना तक के संसार को कैनवस पर उतारने की बाजीगरी, दोनों में समान दखल रखने वाले व्यक्तित्व का नाम है प्रकाश बाल जोशी

मुंबई, जो कभी बम्बई थी। इसी बम्बई की बेतहाशा भीड़ में 1976 में एक और नाम प्रकाशजी का जुड़ गया। शुरुआत उन्होंने पत्रकारिता से की, फिर दुनिया को देखने-समझने का उनका अपना अलग नजरिया उन्हें साहित्य रचना के बाद ब्रश-इंक जैसे माध्यमों की ओर खींच ले गया और उन्होंने कागज-कैनवास को जीवंत कर दिया। आज ‛प्रकाश बाल जोशी’ अन्तर्राष्ट्रीय मंच पर एब्सट्रेक्ट आर्ट का चिरपरिचित नाम है। देश सहित विदेश के दर्जनों शहर में सामूहिक-एकल प्रदर्शनी लगा चुके और कई पुरस्कारों से सम्मानित प्रकाश जोशी इन दिनों नीले (ब्लू) रंग की आध्यात्मिकता को कैनवास पर उतारने के प्रयास में जुटे हैं। पेंटिग उनके लिए सिर्फ एक कृति नहीं है, बल्कि इसके जरिए वे अपनी गहरी दार्शनिक समझ को विभिन्न रंगों की मदद से आकार देते हैं। नीले रंग के आध्यात्मिकता पर आधारित प्रकाशजी की कला प्रदर्शनी इन दिनों पुणे के औंध में वैश्विक कला पर्यावरण नाम से चल रही है। 17 फरवरी तक चलने वाली यह सामूहिक प्रदर्शनी महान मराठा संत-कवि तुकाराम की 411वीं जन्मशती पर आयोजित की गई है।

पत्रकार, लेखक और कलाकार

पुणे से रसायन विज्ञान में स्नातक करने के बाद प्रकाशजी ने अपने अंदर की कुलबुलाहट को देखते हुए पत्रकारिता में परास्नातक कर लिया, फिर ‛केसरी’ के साथ पत्रकारीय सफर की शुरुआत की। ‛फ्री प्रेस’ सहित कई जगहों पर काम करने के बाद मुंबई टाइम्स ऑफ इण्डिया से जुड़े। यहां काम के दौरान उन्होंने बम्बई की सरपट भागती जिंदगी और कंकरीट की भीड़ में चुपचाप सिसकती-खिलखिलाती, तो कभी लड़ते-झगड़ते चेहरों को देखा और इन्हीं ने उनके अंदर के दबे-छुपे कलाकार-लेखक को जगाया। बचपन इगतपुरी के नैसर्गिक गोद में बिताने वाले प्रकाशजी के अंदर ईश्वर-अध्यत्म-दर्शन यानी प्रकृति के विभिन्न रूपों की खूबसूरती पहले से मौजूद थी, अब मानवीय भीड़ ने उन्हें और नए आयाम दिए, फिर पत्रकारिता के बीच कला भी स्वरूप लेने लगी। वे हंसते हुए बताते हैं, “कभी किसी प्रेस कॉन्फ्रेंस में वक्ता का भाषण सुनते हुए, तो कभी संपादकीय की पकाऊ मीटिंग के बीच उनके हाथ अपने आप टेढ़ीमेढी लकीरों से एब्सट्रेक्ट आर्ट बनाने लगे।” उनकी ड्राइंग पर यशवंत चौधरी (वाई.टी.चौधरी) की नजर पड़ी और उन्होंने प्रकाशजी की पहचान कर्नाटक से आए प्रसिद्ध कलाकार आरा से कराई। इस तरह प्रकाशजी के कलाकारीय जीवन की शुरुआत हुई।
इस दौरान प्रकाशजी साहित्य सृजन भी करते रहे। 2015 में मराठी में लिखी उनकी लघु कथाओं का संकलन “जोशी यांची कहानी” प्रकाशित हुई, जिसे महाराष्ट्र सरकार ने ‛बेस्ट लिटरेचर’ अवॉर्ड से नवाजा। इस पुस्तक का पांच भाषाओं हिंदी, अंग्रेजी, गुजराती, मलायलम और फ्रेंच में अनुवाद हुआ।

एब्सट्रेक्ट ही क्यों!

आखिर उन्होंने एब्सट्रेक्ट आर्ट को ही क्यों चुना। इस सवाल पर प्रकाशजी मुस्कुराते हुए कहते हैं कि उन्हें दुनिया एब्सट्रेक्ट ही दिखती है। आगे बताते हैं, “बचपन से ही मैं कला की इसी विधा की तरफ आकर्षित था। बचपन की ड्राइंग में भी मैंने एब्सट्रेक्ट के जरिए ही अपनी भावनाओं को व्यक्त करने का प्रयास किया है।”
प्रकाशजी के लिए पेंटिंग सिर्फ अभिव्यक्ति का माध्यम ही नहीं है, बल्कि कला उनके लिए दर्शन है, जिसके जरिए वे इस संसार, यहां अपनी मौजूदगी की वजह को तलाशने का प्रयास करते हैं। वे बताते हैं, “मैं कौन हूं, यहां क्यों हूं... जैसे प्रश्न मेरे अंतर में उठते हैं, जिनके उत्तर पेंटिंग के माध्यम से तलाशता हूं। कई बार सोते हुए सपने में भी कला का सृजन हो जाता है, जिसे उठते ही स्केच कर संजोने में जुट जाता हूं।”

सफर में मुश्किल भी

कला की दुनिया में आपका सफर कैसा रहा, या पहचान बनाने में कैसी मुश्किलों से सामना हुआ? इसके जवाब में प्रकाशजी सिर्फ इतना कहते हैं कि दिल में जुनून और स्वयं पर विश्वास हो, तो मंजिल कितनी भी मुश्किल हो मिल ही जाती है।” एब्सट्रेक्ट आर्टिस्ट के लिए तो अपनी भावनाओं को कैनवास पर उतारना ही कठिन नहीं होता, उसे लोगों को समझाना भी आसान नहीं होता। रंगों के तालमेल में भी चूक की जगह नहीं होती। नए कलाकरों के लिए वे कहते हैं कि कामयाबी के लिए कठिन परिश्रम और लगातार स्केच करते रहना जरूरी है।


वे कहते हैं, “हमारे आसपास मौजूद पेड़-पौधे-पहाड़, बादल... प्रकृति का हर रंग-स्वरूप अपने आप में बेहद खास है और वे उन्हें अपनी कलात्मक दृष्टि से देखते हुए कैनवास पर आकार देते हैं।” एब्सट्रेक्ट विधा पर गहरी पकड़ रखने वाले प्रकाश जी के अनुसार, “कैनवास पर सलीके से सजे नीले-हरे-पीले रंगों में पेड़-घर-नदी से लेकर रिश्ते-नातों की कई कहानियां छुपी हैं, जो अंतर मन, तो कभी सपनों, तो कभी
अपने आसपास की दुनिया से प्रेरित होकर उन्हें पेंटिंग बनाने को प्रेरित करती हैं।”

इतन सरल व्यक्तित्व!

मुंबई की लगभग सभी नामचीन कलादीर्घा सहित देश के विभिन्न शहरों में एकल-सामूहिक प्रदर्शनी लगा चुके प्रकाश जोशी दुनिया के दर्जनभर शहरों में भी अपनी कला का लोहा मनवा चुके हैं। इनमें बेसल और वेनिस (स्विटजरलैंड), लिस्बन (पुर्तगाल), नॉर्वे, ओसिजेक, (क्रोएशिया) और यूरोप, शिकागो, लास वेगास और मिनियापोलिस के आलावा तुर्की का इजमिर और भूटान में थिम्फू और अन्य कला केंद्र शामिल है। अंतर्राष्ट्रीय कला जगत का प्रसिद्ध नाम होने के बावजूद प्रकाशजी से मिलने जब मैं उनके मुलुंड स्थित PBJ स्टूडियो पहुंची, तो उनके सरल व्यक्तित्व को देखते हुए सहसा विश्वास करना मुश्किल था हो रहा था कि सामने बैठा व्यक्ति एक नामचीन कलाकार, पत्रकार और लेखक है। शायद, इसी लिए कहते हैं कि फलों से लड़ा वृक्ष झुक जाता है। यह बात प्रकाशजी पर बिल्कुल फिट बैठती है।
सोनी सिंह

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