प्रकाशजी का “ब्लू”
“खुश रहे या बहुत उदास रहे,जिंदगी तेरे आस पास रहे।”
बशीर बद्र साहब की इन पंक्तियों में जीवन की गहराई है और इसी गहराई को अपने वृहद कैनवस पर उतारते हैं, वरिष्ठ एब्स्ट्रैक्ट कलाकार प्रकाश जोशीजी। पिछले कुछ समय से वे 'ब्लू' रंग से ही अपने अंतस की भावनाओं को कैनवस पर जीवंत कर रहे हैं। वे बताते हैं, “कभी ये ढलती शाम और गहरी होती रात की ओर चुपके से बढ़ती हुई मेरे मन की उलझनों को बढ़ाती है, तो कहीं मेरे बचपन के करीब इगतपुरी की हरी-भरी वादियों और दूर तक फैले नीले आसमान की चादर तले मुझे पहुंचा देती है।”
ब्लू यानी नीला हां! यह रंग प्रकृति से हमको अनायास ही जोड़ देता है और अपने हर शेड में मानव जीवन से गहरा नाता रखता है। प्रकृति में मौजूद धूप-छांव की तरह ही जीवन भी विविधताओं से भरा है और सुख-दुख, उलझन-सुलझन, प्यार-दर्द... इन सबके बिना अधूरा भी। प्रकाशजी की पेंटिंग्स में भी जीवन का हर पहलू मौजूद है। वे बताते हैं, “एक ही कैनवस में आपको कई शेड्स दिख जाएंगे। एब्स्ट्रैक्ट की यही खासियत भी है और शायद ब्लू की भी। आप जैसा महसूस कर रहे हैं आपको वही कैनवस पर नजर आएगा। जैसे यदि आप खुश हैं तो नीला आपको उमंगों से भर देगा और दुखी हैं तो ढलती शाम सा बोझिल कर देगा।”
प्रकाशजी को ब्लू अध्यात्म के करीब भी ले जा जाता है और वह उस परम ऊर्जा को भी 'ब्लू' में ही महसूस करते हैं। खैर, रंग चाहे जो हो, उनकी दमदार अभिव्यक्ति ही उनकी पहचान है, जिसमें प्रकाशजी पारंगत हैं। तभी तो, कलाकारों की भीड़ में वे देश ही नहीं, विदेश में भी अपना एक अलग मुकाम रखते हैं। उनसे मुलाकातों का सिलसिला आगे भी यूं ही चलता रहेगा और उनके रंगों का सफर भी। फिलहाल, उनके स्टूडियों से निकलते हुए फणीश्वरनाथ रेणुजी की ये पंक्तियां मेरे जेहन में कौंध रही थीं...
“मेरे मन के आसमान में पंख पसारे
उड़ते रहते अथक पखेरू प्यारे-प्यारे!”
◆ सोनी सिंह
प्रकाशजी को ब्लू अध्यात्म के करीब भी ले जा जाता है और वह उस परम ऊर्जा को भी 'ब्लू' में ही महसूस करते हैं। खैर, रंग चाहे जो हो, उनकी दमदार अभिव्यक्ति ही उनकी पहचान है, जिसमें प्रकाशजी पारंगत हैं। तभी तो, कलाकारों की भीड़ में वे देश ही नहीं, विदेश में भी अपना एक अलग मुकाम रखते हैं। उनसे मुलाकातों का सिलसिला आगे भी यूं ही चलता रहेगा और उनके रंगों का सफर भी। फिलहाल, उनके स्टूडियों से निकलते हुए फणीश्वरनाथ रेणुजी की ये पंक्तियां मेरे जेहन में कौंध रही थीं...
“मेरे मन के आसमान में पंख पसारे
उड़ते रहते अथक पखेरू प्यारे-प्यारे!”
◆ सोनी सिंह

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