कूचियों के हुनर से निखरती विरासत

कहते हैं इंसान से पहले कला का जन्म हुआ। मानव सभ्यता में लिखने-बोलने या इसकी समझ रखने-परखने से पहले मन-मष्तिष्क ने कल्पना-कृति बुननी शुरू कर दी। यही वजह है कि जब हमारा आदिम बोलने-लिखने-पढ़ने की समझ नहीं रखता था, तब भी वह भित्ति चित्रों के जरिए अपनी अभिव्यक्ति कर लेता था। उसका यही हुनर उसे प्रकृति को समझने और उस अनुरूप ढलने में अन्य जीवों से आगे ले गया। 
मानव सभ्यता के विकास की सतत प्रक्रिया ने न केवल हमें जानवर से इंसान बनने में मदद की, बल्कि अन्य जीवों को भी अपने अनुरूप ढालने और उन्हें उनकी समझ के मुताबिक अपने समाज का हिस्सा बनाने की कोशिश की। इसकी बानगी भी प्रागैतिहासिक भित्ति-चित्रों में साफ झलकती है, वानुष ने मानुष बनने की प्रक्रिया दीवारों पर उकेरी और इसमें अन्य वन्य जीवों को भी समेकित किया। 
वक्त की रफ्तार ने समझ के साथ-साथ जरूरतें भी विकसित कीं और हम पत्थरों/ शैल-चित्रों की दुनिया से रंग-रोगन एवं कूचियों के संसार में प्रवेश कर गए। 
हमने अपनी कोशिशों पर यहीं विराम नहीं लगाया बल्कि अपने पूर्वजों की थाती को सहेजने-संजोने में भी ऊर्जा खर्ची। तमाम प्राकृतिक, सामाजिक, राजनीतिक उतार-चढ़ाव के बावजूद अपनी कला को सहेजे रखने की वह ललक ही रही होगी, जो आज हम उसे विरासत के तौर पर देख-समझ पा रहे हैं। ऐसे में, हमें इस जिम्मेदारी का बोध होना चाहिए कि कैसे उन तमाम कलाओं के विरासत को सहेजा-संजोया जाए कि आने वाली पीढ़ी भी अपने इतिहास पर गौरवान्वित हो सके। कला-विरासत उसी गूढ़ उद्देश्य की पहल है, जो हममें हमारे उस वजूद को युग-युगांतर तक बनाए रखे, जो हमें बतौर कला अपने पूर्वजों से मिला।
■■ 

Comments