लोक-कला को जिंदा रखने की नई पहल

भारतीय लोक-संगीत और लोक-कला के दो-दिवसीय महाउत्सव का साक्षी होगा बनारस
अचानक सारे मंजर बोल उठे
गूंजा संगीत तो पत्थर बोल उठे

जी हां, यही शख्सियत है लोक-संगीत की। मॉर्डन थियरी के जंजाल में उलझी मौजूदा जिंदगी को अगर कोई स्ट्रेस से बाहर निकाल सकता है, तो वह लोक-संगीत और लोक-कला ही है। रफ्तार की रेस में हम खुद की लोक-कलाओं से बिछड़ते जा रहे हैं, लोक-संगीत हमारे कानों को तो लोक-कला हमारी आंखों को वह सुकून देती है कि हमारी रूह का साबका हमसे हो पाता है। इसीलिए हमें हमारी परंपराओं और लोक-कलाओं को सहेजने की बेहद आवश्यकता है। मधु-मूर्छना और कला-विरासत ने मिलकर इसी कोशिश को आगे बढ़ाने की पहल की है। पारंपरिक लोक कला और संगीत के जरिए लोगों के दिलों में बनारस को जिंदा रखने का संकल्प लिए मधु मूर्छना और कला विरासत एक मंच पर आ रहे हैं। भारत सरकार की ओर से भारतीय लोक कला, संगीत और नृत्य को सहेजने के प्रयास में देश के कई राज्यों में लोक कला-संगीत-नृत्य की विविध विधाओं की प्रस्तुति का श्रीगणेश विश्व की सांस्कृतिक राजधानी बनारस से 12 अप्रैल को हो रही है। दो-दिवसीय इस कला-उत्सव में बनारस संगीत घराने की दिग्गज पद्मश्री डॉ.सोमा घोष लोक-गायन की प्रस्तुति देंगी, तो लोक-कला को सहेजने का बीड़ा उठाने वाली आर्टिस्ट सोनी सिंह की कूचियों का हुनर मधुबनी पेंटिंग्स के रूप में प्रदर्शित किया जाएगा। इस उत्सव के साक्षी बनारसी तो होंगे ही, देश-विदेश के तमाम कलाप्रेमी भी यहां जुट रहे हैं। 
 कला विरासत
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संगीत की साधना में रम जाना और उसे सुनने वाले को आत्मसात कर लेना ही लोक-संगीत की परंपरा रही है। इसी को बढ़ाने का प्रयास हम मधु-मूर्छना के जरिए कर रहे हैं।  
-डॉ.सोमा घोष 
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कला-संगीत और संस्कृति तो बनारस की थाती है, अगर हम बनारसी ही अपने अस्तित्व को नहीं संजोएंगे तो भला कैसे हम खुद की रूह को कह पाएंगे कि हम बनारसी हैं और हमें हमारे होने पर फख्र है।
 -सोनी सिंह


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