बंगाल का बनारसी
आंखों देखी गढ़ता हूं: परमेश पॉल
“किताबों में लिखे जाते हैं, दुनिया भर के अफसाने
मगर जिनमें हकीकत है, किताबों में नहीं रहते।”
अमजद
इस्लाम अमजद की लिखी इन पंक्तियों की तरह ही जिंदगी की पाठशाला में निखरे
कलाकार ‛परमेश पॉल’ से हाल ही में मुलाकात का अवसर मिला। सच है, जो प्रकृति
के सांनिध्य में सीखता-निखरता है, उसमें बनावट-दिखावट की जगह अनुभवों की
थाती होती है। अक्सर, ऐसे लोगों के रास्ते लंबे होते है, लेकिन उन्हें न
मंजिल पाने की जल्दबाजी होती है, न ही चेहरे पर धूमिल थकावट। परमेश कहते
हैं, “मैं सीढ़ी-दर-सीढ़ी चढ़ते हुए ऊपर की मंजिल तक पहुंचना चाहता हूं, ताकि
किसी तल पर कुछ अनदेखा न रह जाए। अनुभव की किताब का कोई पन्ना अनपढ़ा नहीं
रहना चाहिए।” जैसी सीधी-सरल बातें परमेश करते हैं, उनकी जिंदगी की शुरुआत
भी वैसी ही हुई, ‛एक आम परिवार से’।
मूर्ति से कैनवस तक का सफर
पश्चिम
बंगाल के छोटे से गांव नादिया के एक मूर्तिकार परिवार में परमेश का जन्म
हुआ, इसलिए देवी-देवताओं
की मूर्तियां बनाने से लेकर उनमें रंग भरने तक का काम न सिर्फ उन्होंने देखा, बल्कि किया भी। यही वजह रही कि रंग, ब्रश, रचनात्मकता कुछ भी उनके लिए अबूझ या अनछुई नहीं। मूर्ति कला देखते-बनाते कब कैनवस की ओर आकर्षित हो गए, पता ही नहीं चला। आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि कला में पढ़ाई की सोच सकें, इसलिए उन्होंने वाणिज्य (बीकॉम) में स्नातक किया। साथ ही, पेंटिग बनाते रहे, या यूं कहें वे स्वयं कला में अपने गुरु भी बनें और शिष्य भी। कला की बारीकियों को सीखते-समझते हुए उन्होंने इस क्षेत्र में अपने सफर की शुरुआत कोलकाता से की और वर्ष 2004 में वे अपने सपनों की पोटली लिए ‛मायानगरी’ (मुंबई) आ गए। तब से अब तक परमेश देश और विदेश में 13 एकल प्रदर्शनी और दर्जनों सामूहिक कला प्रदर्शनियों में भागीदारी कर चुके हैं। 6 मई से 12 मई तक उनके चित्रों की प्रदर्शनी जहांगीर कला दीर्घा (मुंबई) में लगी थी, जिसमें उन्होंने शिव के वाहन नंदी के रूप में अपनी सुदृढ़ कला को बड़े ही सुंदर तरीके से व्यक्त किया। रंगों के बेहतर समायोजन, बारीकी को देखकर सहज ही मुंह से निकल जाता है कि कला ईश्वर की देन ही है, जिसे कोई कला विद्यालय आपमें तब तक सृजित नहीं कर सकता, जब तक आपको यह हुनर प्राकृति ने न दिया हो!
की मूर्तियां बनाने से लेकर उनमें रंग भरने तक का काम न सिर्फ उन्होंने देखा, बल्कि किया भी। यही वजह रही कि रंग, ब्रश, रचनात्मकता कुछ भी उनके लिए अबूझ या अनछुई नहीं। मूर्ति कला देखते-बनाते कब कैनवस की ओर आकर्षित हो गए, पता ही नहीं चला। आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि कला में पढ़ाई की सोच सकें, इसलिए उन्होंने वाणिज्य (बीकॉम) में स्नातक किया। साथ ही, पेंटिग बनाते रहे, या यूं कहें वे स्वयं कला में अपने गुरु भी बनें और शिष्य भी। कला की बारीकियों को सीखते-समझते हुए उन्होंने इस क्षेत्र में अपने सफर की शुरुआत कोलकाता से की और वर्ष 2004 में वे अपने सपनों की पोटली लिए ‛मायानगरी’ (मुंबई) आ गए। तब से अब तक परमेश देश और विदेश में 13 एकल प्रदर्शनी और दर्जनों सामूहिक कला प्रदर्शनियों में भागीदारी कर चुके हैं। 6 मई से 12 मई तक उनके चित्रों की प्रदर्शनी जहांगीर कला दीर्घा (मुंबई) में लगी थी, जिसमें उन्होंने शिव के वाहन नंदी के रूप में अपनी सुदृढ़ कला को बड़े ही सुंदर तरीके से व्यक्त किया। रंगों के बेहतर समायोजन, बारीकी को देखकर सहज ही मुंह से निकल जाता है कि कला ईश्वर की देन ही है, जिसे कोई कला विद्यालय आपमें तब तक सृजित नहीं कर सकता, जब तक आपको यह हुनर प्राकृति ने न दिया हो!
कोलकाता के होकर बनारस क्यों?
परमेश
की बनाई बहुत सी पेंटिंग्स में बनारस दिखता है, ऐसे में यह प्रश्न मन में
कौंधता है कि जन्मस्थल पश्चिम बंगाल, कर्मस्थल मुंबई, फिर बनारस क्यों? इस
पर वे कहते हैं, “गंगा किनारे ही मेरा बचपन बीता। साथ ही देवी-देवताओं की
मूर्तियों, मंदिर, पूजा-पाठ आदि के बीच पलते-बढ़ते इन सबका मन में गहरा
प्रभाव है। बनारस चूंकि सांस्कृतिक राजधानी है, इसलिए वहां जाने-देखने की
इच्छा हुई। एक बार बनारस गया, तो लगा जितना पढ़ा है यह उससे भी ज्यादा वृहद
है। बस, बार-बार जाता रहता हूं, जिसकी झलक मेरी कृतियों में दिखती है।”
अध्यात्म के साथ प्रकृति का पुट
परमेश
ने अपनी पेन्टिंग्स में आध्यात्मिक विषयों के साथ ही प्रकृति के विविध
रूपों चाहे वह नदी, झरना, पहाड़
हो या पशु-पक्षी को भरपूर स्थान दिया है। वे कहते हैं, “मैं आंखों देखी गढ़ता हूं। अध्यात्म और प्रकृति में खासकर नदी मुझे बहुत आकर्षित करती है, जिससे प्रेरित हो मैं विविध प्रदेशों की यात्रा करता हूं और उन्हीं अनुभवों को कैनवस पर उतारता हूं। मेरी हालिया चित्र प्रदर्शनी में भी बनारस, नासिक, हरिद्वार जैसी जगहों को मैंने उकेरा है।” परमेश कला में बदलते समय के मुताबिक बदलाव का स्वागत करते हैं। उन्होंने अपने चित्रों में नंदी को ‛थ्रीडी’ उभार दिया है। साथ ही वह अपनी पेंटिंग के जरिए प्राकृति, जानवरों की रक्षा का सन्देश देने का प्रयास करते हैं। वे कहते हैं कि प्रकृति को अनदेखा कर मनुष्य का जीवन संभव नहीं हैं, इसलिए नदियों की सफाई, पशुओं को बचाना हर एक की जिम्मेदारी है और मैं अपनी कला के माध्यम से लोगों को जागरूक करने की कोशिश करता रहूंगा।
हो या पशु-पक्षी को भरपूर स्थान दिया है। वे कहते हैं, “मैं आंखों देखी गढ़ता हूं। अध्यात्म और प्रकृति में खासकर नदी मुझे बहुत आकर्षित करती है, जिससे प्रेरित हो मैं विविध प्रदेशों की यात्रा करता हूं और उन्हीं अनुभवों को कैनवस पर उतारता हूं। मेरी हालिया चित्र प्रदर्शनी में भी बनारस, नासिक, हरिद्वार जैसी जगहों को मैंने उकेरा है।” परमेश कला में बदलते समय के मुताबिक बदलाव का स्वागत करते हैं। उन्होंने अपने चित्रों में नंदी को ‛थ्रीडी’ उभार दिया है। साथ ही वह अपनी पेंटिंग के जरिए प्राकृति, जानवरों की रक्षा का सन्देश देने का प्रयास करते हैं। वे कहते हैं कि प्रकृति को अनदेखा कर मनुष्य का जीवन संभव नहीं हैं, इसलिए नदियों की सफाई, पशुओं को बचाना हर एक की जिम्मेदारी है और मैं अपनी कला के माध्यम से लोगों को जागरूक करने की कोशिश करता रहूंगा।
अगली
कला प्रदर्शनी कहा लगाने वाले हैं, इस सवाल पर परमेश बोले, ‛शायद जयपुर!’
जवाब के साथ ही उनके चेहरे पर उनकी सरल मुस्कान उभर आती है और “अभी तो
सिर्फ शुरुआत हुई है। आगे अभी बहुत दूर तक का सफर तय करना है। खुद से वादा
है कि थकूंगा नहीं, रुकूंगा नहीं...” इन शब्दों के साथ वे मुझे छोड़कर आगे
बढ़ गए। मैं भी जिंदगी की किताब के पन्ने सहेजती हुई आगे बढ़ चली। नए अनुभव
और नई मुलाकात की तलाश में...।
■ सोनी सिंह






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