हैदराबाद का 'हरि'
कूचियों के जादूगर हैं नर'हरि'
बेदिल हैदरी साहब का बड़ा ही सुंदर शेर है,
'जितना हंगामा ज़ियादा होगा,
आदमी उतना ही तन्हा होगा।'
मुझ
पर तो यह बात बिल्कुल फिट बैठती है, और दिखावटी-बनावटी भीड़ से घिरी जगह
मैं खुद को ज्यादा तन्हा व असहज महसूस करती हूं। ऐसा ही एक मौका था, कला
मेले का। जब उबाऊ भीड़ से थोड़ी अनमनी हो, मेरी नजरें इधर-उधर कुछ सुकून
तलाशने लगी। तभी मेरी नजर एक ऐसे शख्स पर पड़ी, जो चारों तरफ से बिल्कुल
अनजान खुद में ही खोया, एकदम सहज सा बैठा था, जैसे चारों ओर कुछ और है ही
नहीं। बूथ नम्बर 70 में, अपनी पेंटिंग्स के साथ बैठे नरहरिजी को देखकर ऐसा
लग रहा था, जैसे वे अब भी अपनी नई पेंटिग का विषय तलाश रहे हैं और उसे मन
के कैनवस पर कल्पनाओं की कूची से उकेर रहे हैं। यह पहला मौका था, जब मैं
नरहरिजी से मिली। फिर, जल्द ही अंदाजा हो गया कि वे कलाकारों के इस जमघट
में चिर-परिचित नाम ही नहीं हैं, बल्कि उनके चहेते व्यक्तित्व भी हैं, जो
अपनी कला और सरलता से सर्वप्रिय हैं।
निजामों के शहर का 'आम चितेरा'
निजामों
का शहर हैदराबाद नरहरिजी की कर्मभूमि है, मगर अपने वैभवशाली शहर से
बिल्कुल उलट वे एक आम आदमी हैं। खाटी देहाती परिवेश को उकेरती उनकी कलाकारी
उनके व्यक्तित्व से साथ घुल-मिल कर एकसार सी हो जाती है।
हैदराबाद
के करीब तेलंगाना के एक छोटे से गांव 'कलकुट्टी' में जन्मे नरहरिजी ने
1981 में फाइन आर्ट्स की डिग्री ली, वो भी गोल्ड मेडल के साथ। फिर भी,
गांव, वहां के लोग, भदेसपन से वे खुद को पूरी तरह से अलग नहीं कर सके और
प्रफेशनल आर्टिस्ट होते हुए भी उन्होंने तेलंगाना की लोककला को ही अपनी
कूचियों का आधार बनाया। गांव के लोगों का जीवन, बोलचाल, पशु-पक्षी,
लोक-संगीत एवं चटक रंग, नरहरिजी की पेंटिंग में इन्हीं की भरमार है।
ख़यालों पर हकीकत की कूची
अपनी
ही लोककला के ख़यालों से सराबोर नरहरिजी ने पुरातन, प्राचीनतम और आधुनिकतम
पेंटिंग्स की यूं जुगलबंदी की है कि कला के कद्रदान उनके मुरीद हो जाएं।
लोक कला को सहज उसके प्राचीन रूप में परोसने की बजाय उन्होंने उसे ब्लैक
इंक और दमदार ब्रश स्टोक से कुछ अलग ही अंदाज में परोसा, जिसे 'नरहरि'
स्टाइल कहा जा सकता है। वे इतनी बारीकी और करीने से अपने रंगों-इंक को भरते
हैं कि कई दफा भ्रम होता है कि पेंटिंग बनाई नहीं गई है, बल्कि प्रिंट की
गई है। ब्रश पर उनकी यही पकड़ उन्हें विशेष बनाती है।
मंजिल से बेफिकर उम्दा व्यक्तित्व
सहजता
तो उनके व्यक्तित्व से टपकती है, तभी तो तमाम पुरस्कार बटोर कर भी वह
सिर्फ और सिर्फ अपनी कल्पनाओं को सजीव बनाने की जुगत में खोए रहते हैं।
स्टेट अवॉर्ड मास्टर क्राफ्टमैन 1981, द हैदराबाद आर्ट सोसाइटी अवॉर्ड
1983, 86, 90, 94 उनके नाम रहा। आंध्र प्रदेश कॉउन्सिल ऑफ आर्टिस्ट 1984,
86, ललित कला समृद्धि अवॉर्ड 1986, भारत कला परिषद से 1985, 88 में सिल्वर
मेडल सहित करीब दो दर्जन पुरस्कार पा चुके नरहरिजी कहते हैं, 'मैं सिर्फ
पूर्ण रूप से अपनी कला के प्रति समर्पित हूं और उसके माध्यम से लोक जीवन को
जीने का प्रयास करता हूं। लोक संगीत-गीत, पशु-पक्षी, देशी रंग सब मुझे
आकृष्ट करते हैं और उन्हें पेंटिंग में ढालने की कोशिश करता हूं, यहीं मेरी
मंजिल है और पुरस्कार भी।'
दिल्ली में 4 से 9 मार्च
4 से 9 मार्च के बीच नरहरिजी देश की राजधानी दिल्ली में रहेंगे। यहां ललित कला मेला में भागीदारी कर रहे हैं।
मुम्बई
आर्ट फेयर के बाद नरहरिजी से कई बार मिलने का मौका मिला, हर बार ऐसा ही
लगा कि काश हर खास इंसान खुद को इतना ही आम और सहज' रहने देता, जैसा उसे
प्रकृति ने पृथ्वी पर भेजा था। तब शायद कंक्रीट में बदलते शहर-गांव में बसी
भीड़ में सहज है 'आदमी' से मुलाकात हो जाती। बस! बशीर बद्रजी के एक शेर के
साथ अपनी बात खत्म करना चाहूंगी...
'घरों पर नाम थे, नामों के साथ ओहदे थे,
बहुत तलाश किया, कोई आदमी न मिला।'
ऐसे
में, यदा-कदा कोई इंसान मिल जाए, तो दिल कुछ पल ठहर जाता है। खैर, सफर अभी
आगे भी है, फिर किसी कलाकार से मुलाकात तक के लिए नमस्कार...
◆ सोनी सिंह






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